तिरुपति बालाजी मंदिर के महाप्रसाद के मिलावट पर हिंदू संगठनों में आक्रोश
सरकार द्वारा अधिग्रहित मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से कराए मुक्त
कौशाम्बी संदेश शैलेंद्र द्विवेदी
कौशाम्बी। तिरुपति बालाजी मंदिर में वितरित होने वाले महाप्रसाद की पवित्रता को लेकर हिंदुओं की बहुत श्रद्धा होती है। दुर्भाग्य से इस महाप्रसाद को बनाने वाले घी में गाय व सूअर की चर्बी तथा मछली के तेल की मिलावट के अत्यंत दुखद समाचार प्राप्त हुए हैं।

इससे नाराज विश्व हिंदू परिषद समेत कई हिंदू संगठनों ने सोमवार को जिला मुख्यालय मंझनपुर स्थित डायट मैदान में एकत्रित होकर विरोध प्रदर्शन किया। साथ ही कलेक्ट्रेट पहुंचकर अतिरिक्त मजिस्ट्रेट को राज्यपाल संबोधित ज्ञापन सौंप कर पूरे प्रकरण की जांच कर आरोपियों के आवश्यक कार्रवाई की मांग की है। जिला मुख्यालय मंझनपुर स्थित डाइट मैदान में एकत्रित हुए हिंदू संगठनों के पदाधिकारी व कार्यकर्ताओं ने आंध्र प्रदेश सरकार विरोधी नारे लगाए इसके बाद कलेक्ट पहुंचकर अतिरिक्त मजिस्ट्रेट को ज्ञापन सौंपा इस दौरान जिला अध्यक्ष अवधेश नारायण शुक्ला व जिला मंत्री नीलमणि त्रिपाठी ने कहा कि
तिरुपति बालाजी मंदिर में बनाने वाले महाप्रसाद में घी में गाय व सूअर की चर्बी तथा मछली के तेल की मिलावट के अत्यंत दुखद समाचार प्राप्त हुए हैं। इसकी वजह से पूरे देश का हिंदू समाज आक्रोशित हैं। इस पवित्र तीर्थ का संचालन आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित बोर्ड के द्वारा होता है। वहां केवल महाप्रसाद बनाने के मामले में ही हिंदू आस्थाओं के साथ खिलवाड़ नहीं किया गया अपितु हिंदुओं के द्वारा अत्यंत श्रद्धा भाव से अर्पित की गई देव राशि (चढ़ावा) के सरकारी अधिकारियों व राजनेताओं द्वारा दुरुपयोग के भी कष्टकारी समाचार मिलते रहते हैं। कई बार तो हिंदुओं के धर्म पर आघात कर हिंदुओं का धर्मांतरण करने वाली संस्थाओं को इस पवित्र राशि से अनुदान देने के समाचार भी मिलते रहे हैं। कई अन्य राज्य सरकारें भी मंदिरों की संपत्ति व आय का निरंतर दुरुपयोग करती रहती हैं तथा उनका उपयोग गैर हिंदू और हिंदू विरोधी कार्यो में करती रही है। मान्यवर, हमारे देश में संविधान के सर्वोपरि होने की दुहाई बार-बार दी जाती है परंतु दुर्भाग्य से हिंदुओं की आस्थाओं के केंद्र मंदिरों पर विभिन्न सरकारें अपना नियंत्रण स्थापित कर हिंदुओं की भावनाओं के साथ सबसे घृणित धोखाधड़ी संविधान की आड़ में ही कर रही हैं। जो सरकारें संविधान की रक्षा के लिए निर्माण की जाती हैं वे ही संविधान की आत्मा की धज्जियां उड़ा रही है। अपने निहित स्वार्थ के कारण मंदिरों का अधिग्रहण कर वे संविधान की धारा 12, 25 व 26 का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन कर रही हैं। क्या स्वतंत्रता प्राप्ति के 77 वर्ष बाद भी हिंदुओं को अपने मंदिरों का संचालन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती? अल्पसंख्यकों को अपने धार्मिक संस्थान चलाने की अनुमति है परंतु हिंदू को यह संविधान सम्मत अधिकार क्यों नहीं दिया जा रहा? यह सर्व विदित है कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिरों को लूटा और नष्ट किया था। अंग्रेजों ने चतुराई पूर्वक उन पर नियंत्रण स्थापित करके उन्हें निरंतर लूटने की प्रक्रिया स्थापित कर दी। स्वतंत्रता के 77 वर्ष बाद भी भारत की सरकारें इस औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त है और हिंदुओं के मंदिरों पर नियंत्रण स्थापित कर लूट रही है।
तिरुपति बालाजी व अन्य स्थानों पर की जा रही अनियमितताओं के कारण अब हिंदू समाज का यह विश्वास हो गया है कि अपने मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराए बिना उनकी पवित्रता को पुनर्स्थापित नहीं किया जा सकता। यह स्थापित मान्यता है कि हिंदू मंदिरों की संपत्ति व आय का उपयोग मंदिरों के विकास व हिंदुओं के धार्मिक कार्यों के लिए ही होना चाहिए। वास्तविकता यह है कि मंदिरों की आय व संपत्ति की खुली लूट अधिकारियों व राजनेताओं के द्वारा तो की ही जाती हैं कई बार उनके चहेते हिंदू विरोधियों द्वारा भी की जाती है। आपसे निवेदन है कि आप अपनी राज्य सरकार को उनके द्वारा नियंत्रित सभी हिंदू मंदिर अविलंब मुक्त करके हिंदू संतो व भक्तों को एक निश्चित व्यवस्था के अन्तर्गत सौंपने के लिए प्रेरित करें। इस व्यवस्था का प्रारूप पूज्य संतों ने कई वर्षों के चिंतन मनन व चर्चा के बाद निर्धारित किया है। ज्ञापन सौंपते समय मुख्य रूप से विश्व हिंदू परिषद के विभाग अध्यक्ष अजय पांडेय जिलाध्यक्ष अवधेश नारायण शुक्ला , जिला मंत्री नीलमणि, जिला संयोजक विवेक, जायसवाल, जिला गोरक्षा प्रमुख रूपेंद्र शर्मा, जिला सह मंत्री राजेंद्र पाल, राम अभिलाष, जगदीश केसरवानी, समर बहादुर, राजेश कुशवाहा, अजय जायसवाल आदि मौजूद रहे।
